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मृगतृष्णा से मोक्ष तक

                
                                                         
                            मुझे जितना नहीं है जग को,
                                                                 
                            
नाही किसी को लुभाना हैं!
अपना-पराया, हार-जीत — की मुझे तलाश नही ,
मैं तो खुद की तलाश में हूँ, मुझे खुद को पाना है।
संसार की सीमाओं से ऊपर उठकर
अपने अस्तित्व का बोध करना है।
मैं इन मृगतृष्णाओं से वंचित ही सही,
ईश्वर द्वारा प्रदान किए गए
इस जीवन को पूर्णता से जीना है।
न कोई स्पर्धा, न कोई तुलना,
बस अपनी आत्मा का प्रेषक हूँ,
कुछ पाने की चाह नहीं, स्वयं का अन्वेषक हूँ।
यह पथ मेरे लिए जरुरी हैं एक साधना है,
जहाँ हर श्वास में एक नई दिशा है;
मुझे संसार को नहीं, स्वयं को ढूँढ़ना है।
भीड़ के मध्य रहकर भी जो निर्विकार है,
शून्य है वही सत्य  से वासिभुत होता है;
जो स्वयं में ही ढूंढता ब्रह्माण्ड को
असल में स्वयं को पाने के समीप होता है।
क्योंकि इसी में मुक्ति है, इसी में मोक्ष का सार है।
अंततः—जब मोक्ष का सार मिल जाए,
तो समझ लो कि स्वयं को पा लिया है।
और मैं इस मार्ग पर चलने को आतुर हूँ…
इस निष्ठा से आगे बढ़ो
ये ब्रह्माण्ड तुम्हारे साथ हैं
नोट - इस कविता मै जहाँ जहाँ मै लिखा हो पाठक उसे स्वयं समझें
— भूषण सिंह ‘अन्वित’


 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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