माटी का बलिदान है
व्यर्थ ना जायेगा
मैं खून की रक्त की एक-एक
बूंद से माटी का मूल्य चुकाऊंगा
जिस धरती में मुझे अपनी प्रकृति सौंदर्य
से प्रकृति में सुलाया उस माँ को
कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ
वो माँ क्या माँ है
जगत जननी सृष्टि की रखवाली
फसलों की हरियाली
यही है सुबह की खुशहाली
जब माँ हो संकट में
कर दो अपने प्राणों का न्योछावर
एक-एक शरीर की बूंद तक
अपनी धरती माँ को तुम बचाओ
यही है सृष्टि की एक धरा
मैं सभी वीरों, देशभक्तों को प्रणाम
करता हूँ जिसने अपनी रक्त की बूंद
तक माँ को बचाया धन्य है ऐसा सूरवीर
माटी का बलिदान व्यर्थ ना जायेगा
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