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सारे अमूर्त अमर्त्य गीत

                
                                                         
                            तुम्हें तो याद भी नहीं
                                                                 
                            
अब कुछ भी
मानो
खो गयी है
तुम्हारी याददास्त
जीवन की
भुलभुलैया में खोकर
होकर
तुम खामोश..!

सुनती हो... ?
हमने रोपा था जो प्यारा पौध
अपनी जजवातों का
अब वह भी
बहुत बड़ा हो गया है
मेरी कविता में,
फ़ल भी लग गये हैं
मीठे मीठे !

लेकिन खुद में
छुपने की तुम्हारी जिद से
निकल रही है
तेज चिलचिलाती धूप
जिसमें
झुलस रहे हैं शब्द
सभी सूक्ष्म निहित अर्थ !

मैं भी तो लिख रहा हूं
कुछ निरर्थक
अथक, अकथ, अबूझ
अलभ्य
तुम्हारी गैर-मौजूदगी में !

अब मुझमें भी
मुखरित है शाश्वत स्वर
गुनगुनाने लगा हूँ
आशा-उमंग के
समवेत शांति प्रेम गीत
जब होश आये
तो तुम भी सुनना जरुर
आत्मा की पुकार
मर्त्य जीवन के
सारे अमूर्त अमर्त्य गीत !
- भास्करानंद झा भास्कर
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2 घंटे पहले

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