एक ही गलती हर दफा करता रहा मैं
रुकना सीखा नहीं बस चलता रहा मै
बन गया मैं अपने ही दिल का कातिल
कहना था दिल की बात तो डरता था मै
खुश रहता हूं न जाने किन बातों पर
तन्हा ही ग़मों में संभलता रहा मैं
कितना पसंद है मेरा गम लोगों को
बेमतलब महफिल में चमकता रहा मै
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