मोहब्बत की जुस्तजू लिए फिरते रहे
इसी तलाश में खुदको भी खोया
मेरी वसल की ज़मीन पर ना जाने
किसने ये हिज्र का बीज बोया
जाने कितनी रातें रो रो के गुज़ारी
कितने महिनों तक नहीं मैं सोया
इतना कोई किसी के मरने पे नहीं रोता
जितना उसके बिछड़ने पे मैं रोया
- बेफ़िक्र ते बेपरवाह
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