मुझे ज़रूरत पर बस थोड़ा सा उधार चाहिए था,
एक ऐसा ही तो भरोसेमंद यार चाहिए था।
जिससे मोहब्बत होती गई, वही शख्स बेवफा होता गया,
मुझे तो मेरा वो महबूब वफादार चाहिए था।
जो कभी महफ़िलों की जान हुआ करता था ,
आज उसे खुद से मिलने के लिए भी इतवार चाहिए था।
चार-दीवारी में बंद रहता है अब वो लड़का,
जिसको गांव का हर एक कमरा हवादार चाहिए था।
-बसंत पंवार प्रजय
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