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मैं अपने जज्बात लिख रहा हूँ।

                
                                                         
                            मैं अपने दर्द लिख रहा हूँ,मैं अपनी बात लिख रहा हूँ।
                                                                 
                            
तुम महज लफ्ज़ समझ रहे हो, मैं अपने जज्बात लिख रहा हूँ।

उसके बनावटी चेहरे ने, तुमको गुमराह कर दिया है,
मैं उस चेहरे के पीछे छिपी, उसकी औकात लिख रहा हूँ।

बना फिरता है जो रहबर, वो दिल में ज़हर रखता है,
मैं उसकी साज़िशों की आज, हर एक करामात लिख रहा हूँ।

जिसे हमदर्द समझा था, उसी ने खंजर घोंपा है,
मैं उस रिश्ते में खाए ज़ख्मों की, अज़ीज़ सौगात लिख रहा हूँ।

उससे वफ़ा की उम्मीद में, खुद को ही मिटा डाला मैंने,
मैं खामोशी से सहकर अपनी, वो बर्बाद रात लिख रहा हूँ।

उसे फुर्सत नहीं है एक पल भी, पलट कर मुझे देखने की,
मैं पागल जिसे अपनी गज़लों में, पूरी कायनात लिख रहा हूँ।

ज़माने को शिकायत है कि, 'बसंत' कड़वा लिखता है,
मैं आईना दिखा रहा हूँ, बस अपने हालात लिख रहा हूँ।

-बसंत पंवार प्रजय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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