यह जो तुम मोहब्बत के तराने गा रहे हो,
लगता है पहली बार इश्क़ को आज़मा रहे हो।
मेरे हालत पे हँसने वाले, मुझे हंसी आती है तुम पर,
कि मेरे ही नक्श ए कदम पर तुम चलने जा रहे हो ।
हुस्न-ए-यार की साज़िशें से , कहाँ वाक़िफ़ हो ,
अभी तो तुम सिर्फ़ उजालों से दिल बहला रहे हो।
जिस आग में जलकर राख हुआ है मेरा आशियाना,
उसी आग से तुम अपना चिराग़ जला रहे हो।
वफ़ा के दावों में छुपा ज़हर अभी चखा नहीं,
तुम भी ख़ामख़ा दीवानगी का जश्न मना रहे हो।
चिराग़-ए-आरज़ू बुझ जाएगा एक हवा के झोंके से,
तुम किस गुमान में हवाओं से शर्त लगा रहे हो।
नसीहत मान लो, लौट आओ अभी वक्त है ' बसंत ',
तुम उस राह निकल पड़े हो जहाँ सब कुछ गँवा रहे हो।
-बसंत पंवार प्रजय
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