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पलायन ।

                
                                                         
                            जिसको चाहा उसे भूल जाना पड़ा
                                                                 
                            
दिल तो लगता न था पर लगाना पड़ा
हम थे मुफ़लिस बहुत सी थी मजबूरियां
इसलिए छोड़कर घर को जाना पड़ा

दर्द. दिल के हमेशा छुपाता रहा
ग़म में था मैं मगर मुस्कुराता रहा
मुफलिसी और कुछ तो थी मजबूरियां
दर-बदर ठोकरें जिससे खाता रहा

कुछ तो अपने रहे कुछ पराए रहे
दर्द देते रहे हम छुपाए रहे
चक्र ऐसा चला कुछ समय का सखे
जिनकी खातिर जले वो जलाए रहे
- बजरंगी लाल
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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