छोड़ दी ओ सारी गलियाँ,आ गए हम कहाँ,
चंद पैसों के लिए रह गए अपने जहाँ,
सुबह होते काम है,ना सुकूं,ना आराम है,
फिर भी सिक्को की खनक को मान सुख,हम यहाँ
छोड़ दी ओ सारी गलियाँ,आ गए हम कहाँ,
खुद ही हाथों से बनाना, खुद ही खाना, याद है,
माँ के हाथों का खिलाना रूठना-गुस्सा-मनाना,
माँ का बाहों मे सुलाना,आँचल में उसका छुपाना,
भूल कर ओ सारा ड्रामा,आ गए हम कहाँ,
छोड़ दी ओ सारी गलियाँ,आ गए हम कहाँ,
चंद पैसों के लिए ,रह गए अपने जहाँ|
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