तेरे कहने पे ही क्यूँ कर, खुदा मैं मान लूँ तेरा
अगर वो सिर्फ़ तेरा ही खुदा निकला तो क्या होगा?
जरा कोशिश तो कर बे हर्फ़ बे अल्फ़ाज़ व नंबर के
खुदा कैसा तेरा होगा, तेरी तस्बीह का क्या होगा ?
मोहब्बत और इबादत में तो, टेक्नोलॉजी नहीं होगी !
वगर ना हम गरीबों की, खरीदारी का क्या होगा ?
बड़ी हैरत, तेरे होने का ही, अहसास गायब है !
तू सब में है, मगर नुस्खा तेरे पाने का, क्या होगा ?
हाँ ! उसके होने का एक्सास ही, खालिस 'इबादत' है
यूँ ही ता उम्र गर, सजदे में, सर मारा तो क्या होगा ?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X