आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हाँ ! उसके होने का एक्सास ही, खालिस 'इबादत' है

                
                                                         
                            तेरे कहने पे ही क्यूँ कर, खुदा मैं मान लूँ तेरा
                                                                 
                            
अगर वो सिर्फ़ तेरा ही खुदा निकला तो क्या होगा?

जरा कोशिश तो कर बे हर्फ़ बे अल्फ़ाज़ व नंबर के
खुदा कैसा तेरा होगा, तेरी तस्बीह का क्या होगा ?

मोहब्बत और इबादत में तो, टेक्नोलॉजी नहीं होगी !
वगर ना हम गरीबों की, खरीदारी का क्या होगा ?

बड़ी हैरत, तेरे होने का ही, अहसास गायब है !
तू सब में है, मगर नुस्खा तेरे पाने का, क्या होगा ?

हाँ ! उसके होने का एक्सास ही, खालिस 'इबादत' है
यूँ ही ता उम्र गर, सजदे में, सर मारा तो क्या होगा ?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर