जेठ मास की तपती धूप, अग्नि सी बरसती ज्वाला है,
श्रद्धा और भक्ति का संगम, निर्जला एकादशी निराला है।
बिना जल के जो व्रत रखते, प्रभु चरणों में ध्यान लगाते,
आत्म-संयम की अग्नि में, अपने पाप सब जलाते हैं।
न अन्न का दाना न जल की बूँद, तन-मन को जो निहारते हैं,
भीमसेन की तपस्या जैसी, अटूट विश्वास को पुकारते हैं।
भक्ति के इस कठिन मार्ग पर, जो धैर्य का दीप जलाते हैं,
स्वयं श्री हरि नारायण, उनको अपनाकर हर्ष मनाते हैं।
गंगा के पावन जल जैसा, मन का भाव निर्मल हो जाए,
दान-पुण्य के इस पर्व में, दरिद्रता का हर दुख मिट जाए।
स्वर्ग का द्वार खोलती एकादशी, मुक्ति का संदेश लाती है,
निर्जला के इस कठिन व्रत से, आत्मा परमात्मा से मिल जाती है।
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