आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कांवड़ यात्रा

                
                                                         
                            कांधे पर कांवड़ साजे,
                                                                 
                            
मुख पर 'हर-हर महादेव' का नाम,

एक तरफ है निश्छल भक्ति,
एक तरफ केवल शो-शा का काम।

असली वह जो नंगे पांव,
मीलों दूर पैदल चलता है।

पांवों के छालों में भी,
जिसका विश्वास न ढलता है।

जल गंगा का लाकर जो,
शिव पर श्रद्धा से ढारता है,

बिना प्रदर्शन, शांति भाव से,
अपने ईश्वर को पुकारता है।

त्याग, तपस्या, प्रेम, नियम,
यह असली रूप भक्ति का है।

नकली वह जो डीजे के शोर में,
अपनी ही धुन में खोए हैं।

भक्ति पीछे छूट गई,
दिखावे के बीज संजोए हैं।

हुड़दंग, प्रदर्शन, भारी भीड़,
सड़कों पर रुतबा जमाना,

भोले के नाम की आड़ में,
दूसरों को परेशान करना।

जहाँ न संयम, न कोई मर्यादा,
वह रूप केवल छल का है।

सार यही है...

कांवड़ नहीं नकली या असली,
असली-नकली तो मन होता है।

निष्काम भाव से जो बह जाए,
वही सच्चा सावन होता है।

जल चढाओ तो श्रद्धा से,
अहंकार को दूर हटाकर,

शिव तो बस भाव के भूखे हैं,
मन को थोड़ा सा झुकाकर।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
17 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर