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हम मशीन नहीं हैं

                
                                                         
                            हम मशीन नहीं, जो चलते रहें एक ही चाल से,
                                                                 
                            
कभी थक जाते हैं हम भी जीवन के जंजाल से।

हर दिन एक सी ऊर्जा, एक सा वेग कहाँ?
कभी मन उलझता है, तो कभी ठहरता है यहाँ।

कभी बेबसी में, कभी बिना किसी कारण ही,
भीतर का समंदर उमड़ पड़ता है आँसुओं में कभी।

ऐसे में खुद को कोसों नहीं, थोड़ा थमना सीखो,
ज़ोर न डालो मन पर, बस थोड़ा जताना सीखो।

रुको कुछ पल, सांसें लो गहरी और शांत हो जाओ,
बेकार के विचारों को, हवाओं में बह जाने दो।

हल्का होने दो मन को, इसे फिर से खिलने दो,
ज़रा ज़माने से कटकर, खुद से खुद को मिलने दो।

याद रखना, हर रुकना पीछे हटना नहीं होता,
लौटकर आए हर मुसाफिर, कभी हारता नहीं होता।

यह छोटा-सा विराम, एक नई शक्ति भर जाता है,
फिर से उठ खड़े होने को, रास्ता मिल जाता है।

पूरी तैयारी से, नई स्पष्टता और मुस्कान के साथ,
जीवन के पथ पर बढ़ो, थामकर प्रभु का हाथ।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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