सुकून-ए-दिल के लिए कुछ तो एहतमाम करूँ।
ज़रा सी धूप चुराऊँ, ज़रा सी शाम करूँ।
तमाम उम्र भागदौड़ से निकल के कभी,
किसी दरख़्त के साए में कुछ आराम करूँ।
उदासी चख ली बहुत, अब ख़ुशी का दौर चले,
हँसी के प्याले से जीने का कोई जाम करूँ।
जहाँ ज़बाँ से ज़ियादा हों दिल की क़ीमतें,
उसी दयार में अपना मैं इक क़याम करूँ।
लबों से कम, मेरी आँखें बयाँ करें दिल को,
ख़ामोशी से भी मोहब्बत का एहतराम करूँ।
जो गर्द-ए-वक़्त मेरे चेहरे पे आ बैठी है,
उसे उतार के फिर ख़ुद से हमकलाम करूँ।
जो बुझ गए हैं, उन्हें फिर हवा नहीं दूँगा,
अँधेरी राह में कुछ और एहतमाम करूँ।
न तख़्त चाहिए मुझको, न ताज की ख़्वाहिश,
फ़क़ीर बन के मैं सफ़र-ए-हयात तमाम करूँ।
बहुत निभा लिए दुनिया के सब तमाशे भी,
बची जो उम्र उसे रब के ही नाम करूँ।
ज़माने भर की तमन्नाएँ छोड़ दूँ 'अज़हर',
बची जो साँस है, उसको ख़ुदा के नाम करूँ।
- अज़हर साबरी
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