कटेंगी ये रातें, सवेरा भी होगा।
तेरी चाह का इक बसेरा भी होगा।
मुसाफ़िर भटकते हैं रातों में अक्सर,
कहीं दूर तारों का डेरा भी होगा।
अभी गर्द-ए-राहों में खोई है मंज़िल,
किसी रोज़ इसका इशारा भी होगा।
मुक़द्दर से लड़ना न छोड़ ऐ मुसाफ़िर,
तेरे नाम का इक सितारा भी होगा।
जो अश्क़ों को पलकों पे रखकर चले हैं,
उन्हीं के लिए इक किनारा भी होगा।
अभी धूप है तो परेशान मत हो,
कहीं शाम का भी नज़ारा भी होगा।
जो ख़्वाबों के गुलशन सजाए हैं दिल ने,
कभी उनका मौसम दुबारा भी होगा।
ये टूटा हुआ दिल जो फिर मुस्कुराए,
वही दर्द तेरा सहारा भी होगा।
- अज़हर साबरी
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