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नाराज़ हो के...

                
                                                         
                            नाराज़ हो के जब वो मेरी जान चल पड़े।
                                                                 
                            
क़दमों के साथ दिल के भी अरमान चल पड़े।

रुख़सत किया जो उसने हमें मुस्कुरा के आज,
आँखों में ले के अश्कों का तूफ़ान चल पड़े।

रुख़ ज़िंदगी ने मोड़ लिया जिस तरफ़ कभी,
हम भी उसी तरफ़ दिल-ओ-जान चल पड़े।

सच का रफ़ीक़ कोई नहीं था जहाँ में पर,
हम ले के अपने साथ ये ईमान चल पड़े।

तूफ़ान क्या झुकाएगा हिम्मत को दोस्तों,
सर पर जुनून बाँध के मैदान चल पड़े।

तन्हा चले थे राह में, पर कारवाँ बना,
देखा तो पीछे कितने ही इंसान चल पड़े।

आवाज़ दी है वक़्त ने 'अज़हर' कुछ इस तरह,
हम छोड़ कर हर एक का एहसान चल पड़े।
- अज़हर साबरी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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