मोहब्बत का कोई सच्चा फ़साना अब कहाँ मिलता।
जिसे दिल ढूँढता है वो ज़माना अब कहाँ मिलता।
त'अल्लुक़ की इमारत खोखली बुनियाद पर ठहरी,
मोहब्बत में वफ़ाओं का ख़ज़ाना अब कहाँ मिलता।
दुकानों की तरह सजने लगे हैं अब तो सब रिश्ते,
बिना मतलब कोई रिश्ता निभाना अब कहाँ मिलता।
समझ लेते थे आँखें देख कर ही हाल-ए-दिल सबका,
बिना बोले वो सब कुछ जान जाना अब कहाँ मिलता।
सलीक़ा ही बदल डाला है इस दौर-ए-तरक़्क़ी ने,
ख़तों में दिल धड़कने का ज़माना अब कहाँ मिलता।
चले आते थे महफ़िल में बिना कोई सबब ढूँढे,
यूँ ही अपनों से मिलने का बहाना अब कहाँ मिलता।
बचा कर रख लिया है ख़ानदानों का भरम हमने,
गिरेबाँ चाक कर सच बोल जाना अब कहाँ मिलता।
दिलों की दूरियाँ अब फ़ासलों से नापी जाती हैं,
गले मिलकर किसी दिल को मनाना अब कहाँ मिलता।
हुआ 'अज़हर' बहुत रुसवा मोहब्बत की गली में यूँ,
मगर फिर टूटकर दिल को लगाना अब कहाँ मिलता।
- अज़हर साबरी
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