ख़ामोशियों से बात बढ़ाना भी सीखिए।
दिल का दीया हवा में जलाना भी सीखिए।
हर राज़ को ज़ुबाँ पे सजाया न कीजिए,
ख़ामोशियों में दर्द सुनाना भी सीखिए।
नफ़रत अगर मिले तो मोहब्बत ही बाँटिए,
पत्थर के दिल में फूल खिलाना भी सीखिए।
माँ की दुआ से बढ़ के नहीं कोई रहनुमा,
जीते-जी उसका हक़ निभाना भी सीखिए।
बिखरे जो आईने तो शिकायत न कीजिए,
किरचों से अपना अक्स सजाना भी सीखिए।
तूफ़ाँ अगर मिले तो किनारों की फ़िक्र क्या,
मौजों पे अपनी नाव चलाना भी सीखिए।
मंज़िल मिली है किसको बिना इम्तिहान के,
दुश्वारियों में राह बनाना भी सीखिए।
गिरना भी ज़िंदगी का ही इक दौर है यहाँ,
गिरकर के उठना, उठ के संभलना भी सीखिए।
कब तक चराग़-ए-ग़ैर से होगी ये रौशनी,
अपने लहू से दीप जलाना भी सीखिए।
ग़म से ही हौसलों को बढ़ा लीजिए 'अज़हर',
दर्द-ए-जिगर को नग़्मा बनाना भी सीखिए।
- अज़हर साबरी
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