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जो रात-दिन ही...

                
                                                         
                            जो रात-दिन ही फ़क़त इल्तिजा से डरते हैं।
                                                                 
                            
वो अपने साए की भी हर सदा से डरते हैं।

जो मिट न पाए कभी उस अना से डरते हैं,
हसीं चराग़ हवा की अदा से डरते हैं।

जिन्हें ज़मीर की दौलत कभी न रास आई,
वो अपनी रूह की पहली सज़ा से डरते हैं।

जो तीरगी के निगहबाँ हैं शहर-ए-इल्म में,
वो आफ़ताब की पहली सदा से डरते हैं।

दबा के रखते हैं जो अपनी ही रि'आया को,
वो हुक्मराँ तो ज़रा सी हवा से डरते हैं।

जो लूट कर भी समझते रहे अमीं ख़ुद को,
वो मुफ़्लिसों की उठी बद-दुआ से डरते हैं।

जो बाँटते रहे लोगों में नफ़रतें हर दम,
वो इत्तेहाद की हर इक दुआ से डरते हैं।

जो सच को रोकते आए हैं अपनी ताक़त से,
वो अहल-ए-कलम की इक सदा से डरते हैं।

चराग़-ए-हक़ को जलाते रहे हैं जो 'अज़हर',
वो तीरगी की हर इक इंतिहा से डरते हैं।

- अज़हर साबरी
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2 महीने पहले

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