हवा ख़िलाफ़ सही, हौसला तो जारी है।
हमारी लौ तो सभी आँधियों पे भारी है।
उसूल बेच के ऊँचा मुकाम क्या लेना,
फ़क़त ज़मीर की दौलत ही हमको प्यारी है।
फ़रेब जीत भी जाए तो जीत कैसी है,
शिकस्त सच की नहीं, वक़्त की लाचारी है।
ग़ुरूर टूट ही जाता है एक दिन उनका,
जिन्हें ये वहम है कि सल्तनत हमारी है।
क़दम-क़दम पे बदलते रहे हैं लोग मगर,
हमारे सच की गवाही अभी भी जारी है।
दिलों में नफ़रतें पाले हुए हैं लोग मगर,
हमारी सादगी अब भी सभी पे भारी है।
तमाम उम्र सफ़र में ही कट गई अपनी,
मगर ये रूह अभी तक थकी न हारी है।
जो ख़ौफ़ बाँट के जीते हैं, वो समझ लें अब,
हमारे हाथ में अब भी वही चिनगारी है।
अभी तो वक़्त ने रोका है मेरे क़दमों को,
मगर फ़लक पे नज़र आज भी हमारी है।
मिलेगा चैन ज़माने को तेरी ग़ज़लों से,
क़लम उठाओ कि 'अज़हर' तुम्हारी बारी है।
- अज़हर साबरी
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