हर ज़ख़्म को फूलों से छुपाने नहीं आते।
हर टूटे हुए ख़्वाब सजाने नहीं आते।
अब याद के मौसम भी सुहाने नहीं आते,
रूठे हुए रिश्ते भी मनाने नहीं आते।
ताबीर की उम्मीद में कब तक कोई जागे,
अब ख़्वाब भी आँखों को लुभाने नहीं आते।
जो दिल में उतर जाए, ज़ुबाँ पर नहीं लाते,
हम दिल का कोई राज़ बताने नहीं आते।
सच्चाई पे अड़ जाना तो आदाब हैं अपने,
हम को तो अदालत में बहाने नहीं आते।
ख़ुद्दार क़बीले के हमीं लोग बचे हैं,
दहलीज़ पे सर अपना झुकाने नहीं आते।
सच बोल के अपनों से बिछड़ते रहे, 'अज़हर',
अब झूठ से रिश्तों को बचाने नहीं आते।
- अज़हर साबरी
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