हम ने क्या-क्या तेरी उल्फ़त में गँवाया है न पूछ।
वक़्त ने किस तरह यादों को बुझाया है न पूछ।
दर्द को हमने दुआ समझा तो दिल हल्का हुआ,
किस तरह इक ज़ख़्म ने हमको बचाया है न पूछ।
अब तो हर इक ख़्वाब की ताबीर धुँधली है बहुत,
वक़्त के दरिया में क्या-क्या डूब आया है न पूछ।
एक मुद्दत से कोई ख़त भी नहीं आया मगर,
दिल ने हर आहट को उसका ख़त बताया है न पूछ।
वक़्त की गर्दिश में कितने आईने टूटे मगर,
कौन-सा चेहरा था जो दिल से न मिट पाया न पूछ।
आईना अब पूछता है, मैं वही हूँ या नहीं,
वक़्त ने मुझको कहाँ से क्या बनाया है न पूछ।
- अज़हर साबरी
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