दुनिया से जीत आया अदालत ख़रीद कर।
ख़ुद से ही हार बैठा शराफ़त ख़रीद कर।
झुकना पड़ा ज़मीर को ताक़त ख़रीद कर,
क्या पा सका है कोई इज़्ज़त ख़रीद कर।
सच बिक नहीं सका किसी बाज़ार में कभी,
झूठ आ गया है आज वकालत ख़रीद कर।
दौलत से दिल किसी का मयस्सर नहीं हुआ,
वो ढूँढता रहा है मोहब्बत ख़रीद कर।
जो बेच आए रास्ते में अपनी साख़ को,
क्या जी सकेंगे फिर वो राहत ख़रीद कर।
काग़ज़ के फूलों से कभी ख़ुशबू न आएगी,
सजता नहीं मकाँ कोई जन्नत ख़रीद कर।
क़दमों में उसके झुक गई दुनिया तो क्या हुआ,
ख़ुद से ही हार बैठा हुकूमत ख़रीद कर।
- अज़हर साबरी
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