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दिलों की बात को...

                
                                                         
                            दिलों की बात को लफ़्ज़ों में ढाल कर देखें।
                                                                 
                            
चलो ये ख़्वाब हक़ीक़त में पाल कर देखें।

नज़र पे गर्द है, मंज़र फ़रेब देता है,
चलो निगाह को पहले सँभाल कर देखें।

जो डूबना ही मुक़द्दर है इश्क़ में अपना,
तो क्यूँ न ख़ुद को समंदर में डाल कर देखें।

मिलेगा क्या हमें यूँ ही ख़मोश रहने से,
सवाल जो भी है दिल में, उछाल कर देखें।

जो टूट जाए तो फिर जुड़ नहीं सके शायद,
चलो हर एक त'अल्लुक़ सँभाल कर देखें।

कहा है किसने बिना उसके जी नहीं सकते,
ये वहम भी तो किसी दिन निकाल कर देखें।

- अज़हर साबरी
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3 महीने पहले

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