भूख चेहरे की शराफ़त को मिटा देती है।
ज़िंदगी अपनों से दूरी की सज़ा देती है।
जो हक़ीक़त है वो चेहरों से बता देती है,
ज़िंदगी वक़्त का आईना दिखा देती है।
ताज वालों को भी दर-दर का बना देती है,
वक़्त की एक नज़र शान मिटा देती है।
इम्तिहाँ आदमी की अस्ल बता देती है,
ठोकरें आदमी को ख़ुद से मिला देती हैं।
तिश्नगी ख़ाक में दरिया भी बहा देती है,
जुस्तजू संग से चश्मे भी उगा देती है।
रात जितनी भी अँधेरों को बढ़ा देती है,
एक उम्मीद सहर बनके जगा देती है।
ख़ामुशी दर्द को तहज़ीब सिखा देती है,
चीख़ हर ज़ख़्म की औक़ात बता देती है।
बात लहजे की अगर दिल को चुभा देती है,
उम्र भर की भी रफ़ाक़त को जुदा देती है।
ग़म छुपाने का हुनर सीख लिया है जिसने,
उसकी मुस्कान भी आँखों को रुला देती है।
- अज़हर साबरी
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