अंधेरे शहर में जुगनू सा ख्वाब कर दूँगा।
जो डर गया था उसे कामयाब कर दूँगा।
सफ़र कठिन है मगर हौसला नहीं टूटा,
मैं अपनी राह को ख़ुद आफ़ताब कर दूँगा।
तिरी नज़र की इनायत अगर नसीब हुई,
मैं दर्द-ए-दिल को भी इक गुलाब कर दूँगा।
तिरी ख़मोश निगाहों ने जो लिखा दिल पर,
उसे ज़माने के दिल की किताब कर दूँगा।
जो ज़िंदगी की हक़ीक़त से मुँह चुराते हैं,
मैं उनके सामने सच बेनक़ाब कर दूँगा।
तमाम शहर की आँखों में खटकता हूँ अगर,
मैं अपने सच को ही उनका जवाब कर दूँगा।
वफ़ा के रास्ते आसान कब हुए 'अज़हर',
मगर मैं सब्र से पत्थर गुलाब कर दूँगा।
- अज़हर साबरी
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