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स्वयं हृदय धड़क रहा है

                
                                                         
                            दिनकर चमक उठा है ।
                                                                 
                            
स्वयं हृदय धड़क रहा है

काटो में चलने का प्रण लिया है।
पैरों ने दर्द को सहा है ।

आंखों में एक उम्मीद है किरण की।
उस किरण ने झंझोर दिया है।

सपनो ने भी अपनों को खो दिया है

संघर्ष क्या जानेगा ,पीड़ा क्या जानेगा
उसने तो स्वयं को झोंक दिया है ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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