कलम की स्याही , लाखो एहसाह, जज़्बात, मोहब्बत, लेकर उसके निब तक ही रह जाती है ,
कई कविताएं दिल से निकलकर बस आंखों से बह जाती है ।
वो सफ़ेद काग़ज़ के बीच में दो भीगे हुए धब्बे, लाखो शब्दों को समेटे बस सूख कर रह जाती है,
कई कविताएं दिल से निकलकर बस आंखों से बह जाती है ।
कई कविताओं को सोख लेता है, तकिए का वो खोल,
कईयों को तो उस चद्दर ने अपने अन्दर समाँ लिया,
बहुत सी कविताओं को तो पेट का भूख पचा देता है, कुछ को तो जिम्मेदारियां खा जाती है , बचे हुए कुछ हृदय में समा कर साँसों तक ही रह जाती हैं,
कई कविताएं दिल से निकलकर बस आंखों से बह जाती है ।
- आयुष पटेल
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