अब इस खुशहाल आँखों की गली में ग़म के आँसू आने लगे हैं,
ग़ालिब, मीर या रसखान—सब दीवाने लगने लगे हैं।
इश्क़ के मारे सब आशिक़ दिन की जगह रात में जागने लगे हैं,
और हम ख़ुद मोहब्बत पर क्या कहें, हम तो ख़ुद ख़ुशी को छोड़कर ख़ुदकुशी करने लगे हैं।
— आयुष शर्मा
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