मैं बिल्कुल मौन किरदार हो गया हूं,
आज अखबारी समझदार हो गया हूं,
लिख रहा धड़ल्ले से मुल्क की तकदीर,
मेरी समझ बाजारु गुलाम हो गया हूं,
कहने को आज मैं बिल्कुल पत्रकार हो गया।
लिख रहा तकरीर स्याही बदनाम हो गया हूं,
किसी पार्टी किसी मजहब का शिकार हो गया,
हिल रही चौथी स्तंभ की नींव सरेआम,
मुल्क बलात्कारी घोटालेबाजों का नीलाम हो गया हूं।
बहलाकर फिल्म क्रिकेट की खुमारी में सरेआम,
सैनिकों के ताबूतों की दलाली में गिरफ्तार हो गया हूं,
कुछ को दिख जाती मानवता आतंकियों की अदालत में देर रात,
सैनिकों को बदनाम करता पत्रकार हो गया हूं।
न्यायपालिका पर खींच रही टेढ़ी लकीर दिन रात,
बढ़ता चैनलों पर तकरीर हिंदू मुसलमान हो गया हूं,
24 घंटों की मुनादी मुद्दा गुमनाम हो गया है,
कहने को आज मैं पत्रकार हो गया हूं।
- अवधेश कुमार राय
नौएडा उत्तर प्रदेश
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