नवगीत
है चुनाव में हारे नेता
बुक्का फाड़ रहे।
भयंकर घटना घटी
आती है घिन।
कलुषित सा है लगता
चमकीला दिन।।
मँहगाई ने ऐसा पीसा
केवल हाड़ रहे।
राजनीति गंगा थी
अब नाला है।
अहिंसा के हाथ में
ज्यों भाला है।।
संसद में बैठे रहनुमा
हैं झोंक भाड़ रहे।
-अविनाश ब्यौहार
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