मानव/हाकलि छंद
हिंदी गजल
बारिश है तो पानी है।
पर्वों में गुड़धानी है।।
कोर्ट कचहरी होते हैं ,
फिर भी अभी प्रधानी है।
आंधी अंधड़ उठते हैं,
मौसम ये तूफानी है।
अनाचार जब-जब होता,
सिकुड़ी ये पेशानी है।
आंखों का काजल चोरी,
बहुत बड़ी हैरानी है।
हर घर में है ज्यों होती,
धन की ऐंचातानी है।
दिन की कोई बात नहीं,
रात हुई नूरानी है।
-अविनाश ब्यौहार
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