प्यादा भटक रहा है खुद,
काटता और कट रहा है खुद,
कुछ चलते ढाई कदम, और कुछ चलते तीन,
कुछ चलते तिरछा, और कुछ चलते सीधा,
कुछ दूसरे की रंगभूमि में घूमते-फिरते,
मरते और मारते भी,
और, कुछ अपने ही रंगभूमि के कैदी हैं।
प्यादों की जान, खेल है किसका,
शतरंज का मैदान, जेल है इसका,
सवाल प्यादों का किसी से है,
चाल, चालाकी और नियम है जिसका।
खिलाड़ी की खोज, प्यादे की प्यास है,
सवाल जो पूछना है, यही इसकी एक आस है,
ज़ालिम खिलाड़ी, खुदा को समझता,
चाल, चालाकी, नियम जो रचता।
क्यूँ खिलाड़ी का खेल, और प्यादे की जान,
सवाल गूँजा शतरंज के हर कोने तक,
खुदा की खामोशी से, प्यादा परेशान,
भटका प्यादा क्या समझे,
खेल भी उसका, चाल भी उसकी, चालाकी भी उसकी,
इसी से है वो अनजान,
खिलाड़ी है वो खुद शतरंज का,
खुदा है उसकी असली पहचान।
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