अंधी दौड़ में भागा, सोचा सब बटोर लूँ,
समुद्री तट से गीली रेत मुट्ठी में बाँधी,
दौलत और हर लम्हे का करना चाहा जतन,
जितनी कसी मुट्ठी, रेत उतनी ही फिसली,
सारी मलकियत हुई ओझल, बची हाथों में चुभन।
मुट्ठी खोली तो बचे थे बस तीखे कंकड़,
पर हाथों में बसी थी दर्द की दौलत,
और हथेलियाँ निखरीं घाव के घराने से,
मगर नाखूनों में छुपा था रेतीला वैभव,
क्या बस गंदगी में ही सजा मेरा गौरव?
रेत की लालच में, करा अनदेखा गीला साया,
उसने दिग्गज दौलत को धोखे में भीगाया,
समझ गया यह थी गहरे समुद्र की गहरी चाल,
जादुई जल में जमा थी मायावी मृगतृष्णा,
विषम सागर बुनता, विशालता का भ्रमित जंजाल।
खाली मुट्ठी, अब उसमें भरा था अहसास,
खोलके हथेली छलिया समंदर की ओर फैलाया,
चुनौती उन चालाक लहरों को जो हैं खड़े,
अब कोई घाव न रेत में छुप कर आए,
वो कंकड़, अब मेरे चट्टानी हाथों का क्या उखाड़े?
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