रेत पे पड़े कदमों के चिह्न थे अस्थायी,
लहरों की चादर ने समेटा उनका अस्तित्व।
प्रकृति की हर परछाई, प्रकृति ने ही मिटाई,
है बेहद आम, पृथ्वी पर हर पहचान,
है नश्वर, अनंत जीवन के भी निशान।
कुछ इमारतें थीं अमरता की निशानी,
मगर नई इमारतों ने छीन ली उनकी कहानी।
कुछ उकेरते पत्थरों पर अपने आरज़ी नाम,
धूल में मिट गया वो पत्थर, वो नाम, वो इंसान,
भूत और भविष्य भी हैं पल भर के मेहमान।
शौहरत कमाने में, भूलता जीना यह इंसान,
नाम गाती रहती जिसका कुछ लाखों ज़ुबान।
मगर मृत्यु के उपरांत, इसकी हकीकत बस श्मशान,
याद और कब्र, दोनों लोगों से हैं वीरान,
ना रहती नामों की लकीर, और ना लकीरों के नाम।
न याद, न चिह्न, न नाम, न निशान,
नामों की नगरी से बेहतर अंजान आसमान।
घुल गया मैं असीम ब्रह्मांड में,
उस ब्रह्मांड का भी होगा कभी प्रस्थान,
मेरे नामी वजूद का न होना, यही मेरी पहचान।
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