त्याग के भौतिकवाद की भूमि,
मैं पंछी प्रबुद्ध-रूपी,
सुगंधित वैराग्य को ध्यान कर,
उड़ान भरी ज्ञानोदय की ओर,
साहस के संग पंख खुले निखरकर।
पीछे मुड़के किया अवलोकन,
वो नीड़-रूपी बंधनों को,
नहीं छोड़े रंजिश के अंडे,
सामाजिक गुलामी को किया अलविदा,
क्योंकि वैराग्य की अभिभूत महक,
ना सूंघ पाए बाकी नादान परिंदे।
बायें मुड़ के किया अवलोकन,
वो मायाप्रेमी काक-रूपी मित्रों का,
आकर्षिक चीज़ों का संचय करते,
भ्रम के डाल पर लोभ के फल खाते,
आभासी चमकीले मटकों को निहारते।
दायें मुड़ के किया अवलोकन,
मधु-रूपी प्रलोभन के वन को,
वासनाओं के फल की इच्छा में,
ढेर बुलबुलों ने मीठे फल चबाए,
पर शिकारी के बंधन में फँसके,
माया का जाल ना समझ पाए।
सम्मुख देख के किया अवलोकन,
निज अंतर्मन के अनंत गगन को,
छोड़ के सारे दिशा-भ्रम के फेरे,
शून्य की पावन डगर पर उड़ा,
अब स्वयं ही मकरंद बन,
महकते वैराग्य की यात्रा पर बढ़ा।
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