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कुदरत, कायनात और वो

                
                                                         
                            क़ब्र में वो सड़ रहा,
                                                                 
                            
पर रूह आसमान में।
परिंदा है मर चुका,
फिर क्यों वो उड़ान में।
कुदरत और कायनात, दोनों अलग।
एक में फूल बनके खिल रहा,
और दूसरे में तारा बनके चमका है।
एक में इंसान तक रुक गया,
दूसरे में भगवान से लड़ा है।
एक में पाप करे बहुत उसने,
दूसरे में पुण्य की खोज कर रहा।
एक में नाम बनाते रह गया,
दूसरे में नाम ही सिर्फ बचा।
एक में जान बचाते रह गया,
दूसरे में जहन्नुम से न बच पाया।
एक में ख़्वाब देखे बहुत,
दूसरे में बस याद बनके रह गया।
कुदरत और कायनात, बहुत अलग,
एक में मौत में मिल गया,
दूसरे में अमृता में उलझ गया।
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3 महीने पहले

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