उज्ज्वल धूप से चमकता भव्य स्वर्ण मंदिर,
मीठी मदिरा से महकता विशाल गिरजाघर,
कीमती कालीनों से सजती वो अज़ीम मस्जिद,
पर उन्हीं सीढ़ियों पे बैठा है एक बेघर गरीब।
जो धूप चमकाती गुंबद, वही बनती तपती तज्रीब,
अंदर मदिरा का भोग, बाहर साफ़ पानी न नसीब,
भीतर मखमली बिछौने, बाहर वो लेटा नंगी फ़र्श पर,
रहम की एक नज़र नहीं, कोई कालीन भी नहीं करीब।
मूर्तियाँ को चढ़ते हैं स्वादिष्ट फल और पेड़े,
क्रूस के सम्मुख जलतीं ढेरों मोमबत्तियाँ,
मज़ार पर श्रद्धा से चढ़तीं रेशमी चादरें,
उन्हीं वस्तुओं को घूरता वह एक बेघर गरीब।
फलों से अधिक मीठी लगती उसे सूखी रोटी,
उसके अश्कों की चमक, मोमबत्तियों से अधिक उज्ज्वल,
फटे कपड़े उसके, वो कालीनों से अधिक नर्म,
ईश्वरीय प्रतिमा से अधिक जीवित यह गरीब धड़कन।
जिसकी सेवा करते यह मनुष्य दिन-रात,
उस ईश्वर के हैं कुछ अलग ख्यालात,
बोलता, मेरी बेजान मूर्ति पे इतनी क्यों सेवा?
जब बाहर सीढ़ियों पर हैं गरीब के जज़्बात।
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