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गूंगा गुनहगार

                
                                                         
                            मिट्टी को पिरोया ऐसे, बने सुंदर दृश्य हज़ार,
                                                                 
                            
धुन बहती नदियों की, महक उन फूलों की,
किसी ने धरती को सजाया है यह श्रृंगार,
कौन है वह दिलदार, या कोई काबिल कलाकार?
जिसने अपनी प्रेमिका को किया है यह इज़हार।

पर धोखा है वह प्रेम, और झूठा है वह इज़हार,
जब रोती-गाती, लगाती है धरती पुकार,
तब यह प्रेमी बैठा रहता जैसे कोई गूंगा गुनहगार।

जब भूखे सोते इसके बच्चे, जब होता इसकी बेटियों का बलात्कार,
जब मरते जंग में इसके बेटे, और होते करोड़ों बीमार,
तब पत्थर की खुद मूरत बन जाता यह शिल्पकार।

जब मज़हब के नाम पे बहता खून, और मचता हाहाकार,
जब कटते हैं मासूम जानवर, और होते पकवान तैयार,
तब बहरी हवाएँ छूकर निकलतीं, लातीं न कोई पुकार,
जैसे इस रोती धरती से, हवाओं को भी न रहा सरोकार,
शायद विधाता के दरबार की, हवाएँ भी हो गईं गुनहगार।

यह प्रेमी है बहरा, बुज़दिल और बेकार,
यह प्रेमी है गूंगा, गड़बड़ और गद्दार,
अकेली सहती रही धरती होके लाचार,
इसका कायर प्रेमी ही है असली ज़िम्मेदार।
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3 महीने पहले

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