कोहरे से सजा हुआ है,
मृतकों का शांत साम्राज्य,
है मिट्टी का बिस्तर नर्म,
और पत्थर का कंबल गर्म।
सोए हैं बेफ़िक्री से,
सब मुस्तकिल मेहमान,
सबका स्वागत करता है,
यह अनोखा कब्रिस्तान।
एक के बिस्तर थे शाही,
और मसनद आलीशान,
दूजे की किस्मत में न छत थी,
और न कोई मकान।
किन्तु धरा के इस आँचल में,
क्या राजा क्या रंक,
बिना भेद के न्याय यहाँ है,
मिटा हर एक कलंक।
दौलत-शौहरत रुकी द्वार पर,
छूट गया अभिमान,
कब्र बराबर ऊँची सबकी,
और एक सरीखा थान।
मज़हब और महलों से ज़्यादा,
मुंसिफ़ है यह श्मशान,
जात-पात और भेद न जाने,
पावन है यह अनोखा कब्रिस्तान।
चाहे चिता की बची हो राख,
या ताबूत में सोई लाश,
दोनों की अंतिम मंज़िल,
इस माटी का ही वास।
छूकर इस धरती का आँचल,
दोनों ही खूब रईस,
सोए हैं ऐसे निश्चिंत होकर,
जैसे मिल गई कोई असीस,
न कोई यहाँ है भिखारी,
और न कोई है इधर सुल्तान,
मिट्टी मिलकर सब एक हुए,
महान है यह अनोखा कब्रिस्तान।
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