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एक मुसाफ़िर, जो शहर से ज़्यादा खुद को तलाश रहा है।

                
                                                         
                            मैं शहर को ढूँढ़ने घर से निकला,
                                                                 
                            
शहर तो नहीं मिला, मगर मिल खुद का गया पता।
चार कदम ही चला था कि मन थोड़ा सहम गया,
एक सवाल उठा—क्या यह सफ़र सही रहेगा?
फिर अचानक एहसास हुआ कि
कुछ सफ़र मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं, बल्कि खुद से मिलने के लिए तय किए जाते हैं।
बस फिर क्या था, मैं चला… और चलता गया।
रास्ते बदले, नज़ारे बदले, कुछ चेहरे मिले, कुछ पीछे छूट गए।
कभी उम्मीद ने हाथ थामा, तो कभी अनुभवों ने हौसला बढ़ाया।
लेकिन सफ़र अभी अधूरा है,
क्योंकि अभी बहुत कुछ जानना है, बहुत कुछ सीखना है और खुद को हर दिन थोड़ा और बेहतर बनाना है।
यात्रा अविराम है, हौसले बुलंद हैं,
इरादों में दृढ़ता है और दिल में विश्वास बाकी है।
मंज़िल तक पहुँचने की जल्दी नहीं,
बस राह में अच्छे लोगों से मिलते हुए,
कुछ के जीवन में उम्मीद बनते हुए
और कुछ से जीवन के मायने सीखते हुए आगे बढ़ते जाना है।
संभव है कि एक दिन मंज़िल मिल जाए,
लेकिन उससे भी खूबसूरत होगा यह एहसास
कि इस सफ़र में मैंने दुनिया को समझने के साथ-साथ
खुद को भी पहचान लिया।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
35 मिनट पहले

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