ज़िन्दगी में एक धोखा ज़रूरी है,
किसी का ये नायाब तोहफा ज़रूरी है,
ज़िन्दा रहना तो बच्चों का खेल है अब,
क्यूंकि जीने के लिए एक दफ़ा मरना ज़रूरी है,
हाँ कुछ ख़्वाब हमारे ज़रूर टूटते हैं,
आँसू भी आँखों से कुछ यूँ छूटते हैं,
लेकिन इन मोतियों को थामना होता है,
क्यूंकि पूरा होने के लिए अधूरा होना ज़रूरी है,
होता है कई बार ऐसा जब आप सूने लगते हैं,
जगमगाते उन जुगनूवों में जब आप स्वयं जलते हैं,
लेकिन जलन के बाद ही पत्थर भगवान होता है,
क्यूंकि सवेरा होने के लिए रात होना ज़रूरी है,
अतुल मणि त्रिपाठी
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X