तेरे फ़िराक़ में हर सांस रौशनी में है
ये कैसी आग मुसलसल तेरी कमी में है
ज़बाँ भी चुप, दिल-ए-नासाज़ बे-ख़ुदी में है
मगर जो कह न सके, शरह-ए-आशिक़ी में है
न कोई लफ़्ज़, न आँसू, न आरज़ू बाकी,
तेरे बग़ैर जो जीते हैं बेबसी में है।
हर इक सदा में तेरा नाम ही समाया है
ये तेरा इश्क़ है, या कोई बंदगी में है
कभी नज़र से गिरा, और कभी वफ़ा बनकर
वो शख़्स अब भी कहीं मेरी ज़िन्दगी में है
गुज़र गया जो ज़माना वो लौटता तो नहीं
मगर जो ज़ख़्म दिए थे शगुफ़्तगी में है
कहीं चराग़ बुझे हैं, कहीं सवेरा है
अजीब रंग हर इक मोड़ ज़िन्दगी में है
बचाए रखता है नफ़रत भी दोस्ती के साथ
अजब सी बे-दिली आसिम कहीं दिली में है
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