यूं मुझसे लिपट जाना,
और वो आंखों का नम हो जाना।
मौसम का हल्का हो जाना,
मधम्म सी आवाज का भारी हो जाना।
वो गीली सी हथेलियों की गरमाईस,
छुपा के दर्द,
मुस्कुराहट की नुमाईस।
वो डेढ़ कदम आगे बढ,
पीछे मुड़ कर फिर देर तक निहारना।
वो बस की खिड़की का कांच सरकाना,
छुपा के सब से वो हाथों का हिलाना।
दूर तक देखा मैंने,
तेरा वो भीड़ में खो जाना।
अच्छे से याद है मुझे अब भी,
वो अपने साथ तेरा मुझे भी ले जाना,
मुझे भी ले जाना।
Asni
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X