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रिश्तों की धुन्ध

                
                                                         
                            बाबा,झरोखे के पार ये धुंध देखो
                                                                 
                            
सफेद चादर ने ज्यों सूरज को ढांक दिया।
पौ फटते ही,ये उपरना ना रहेगी रुंध देखो
धुंध भरी सुबह प्रदीप्त हो उठेगी,जब सूरज ने झांक लिया।

कैसा उजला संदेश दे रही है धुंध भरी सुबह
कभी तो दादा -दादी और मां के बीच होगी सुलह।
मैं जानता आपकी हर वेदना बाबा
तराजू के कांटे सा लगे आपका अस्तित्व बाबा।

बीवी भी प्यारी तुमको,आदरणीय मां-बाप भी
साथ देना संगिनी का,मां-बाप का जरूरी साथ भी।
रिश्तो की धुंध में सिमटी आपकी दुविधा लगती मुझे
दो पलड़ों के बीच झूलती कांटे की सुई खलती मुझे।

जो मैं अपने और भावी संगिनी का उदाहरण
रखूं मां के समक्ष, तो शायद कर सकूं इस दुविधा का निवारण।
बीवी के आते ही ना टूट जाए उससे मेरा नाता
आपकी दुविधा संभवतः हल कर सके,मेरे इस भावी रिश्ते का वास्ता।
- अश्विंदर बावा "अश्क"
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4 घंटे पहले

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