मेरा भी हक हैं इस घर में,
यें बात उसे समझाने दें।
उम्र के मारे इस दयार में,
ज़िन्दा हूं तब तक आने दें।
यें वृद्धों का आश्रम नहीं,
यें बदनसीब क़ैद खाना हैं।
तुम बिन जीना, जीना नहीं,
यें शब्द किसी को कहना हैं।
यें बात तुम्हें हीं कहनी थी,
बस तेरे घर तक आने दें।
उम्र के मारे इस दयार में,
सांसों को यही पे चलने दे।
कुछ साल बचे इन सांसों के,
कुछ साल बचे इन पासों के।
चलें जाएंगे छोड़ के सब कुछ,
तुम खुश रहना इन झांसों के।
देना हैं तो अभी दे निवाला,
फिर श्राद्ध तर्पण रहने दें।
उम्र के मारे इस दयार में,
सांसों को यही पे चलने दे।
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