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ख्वाबों का सौदा

                
                                                         
                            उम्र की दहलीज़ पर अब वो बेपरवाह नज़ारे नहीं दिखते,
                                                                 
                            
अपनों की खुशी की खातिर, अब खुद के वो ख्वाब नहीं देखते।
यादों के धुंधले साए में चले गए वो सारे हसीं ख्वाब,
जिनके पूरे होने की हम, रब से मिन्नतें करते थे बेहिसाब।
माँ के सपनों की खातिर, मैं खुद अपने ही वजूद से लड़ गया,
अपने अरमान अधूरे छोड़, घर का ख्याल रखने आगे बढ़ गया।
बाप की तरह कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ समेट लिया है,
ख्वाबों की उस नाजुक डोर को अब हाथों से छोड़ दिया है।
मलाल नहीं है मुझे कि अब मैं पहले जैसा नादान नहीं रहा,
मुझमें लाख बुराइयाँ सही, पर अब मैं खुदगर्ज इंसान नहीं रहा।
मैं अपनों की खातिर अपने ही सपनों को पीछे छोड़ आया हूँ,
काल्पनिक दुनिया से निकलकर, मैं आज हकीकत जानने आया हूँ।
अपने ही अरमानों का गला घोटकर भी मुस्कुराना सीखा है,
आगे बढ़ना मैंने अपने पिता के उसूलों और संघर्षों से सीखा है।
कैसे खुद अधूरी ख्वाहिशों के साथ भी सीना तानकर चला जाता है,
यह हुनर मैंने किसी किताब से नहीं, अपने पापा की आँखों से सीखा है।
अब कोई शौक नहीं बचा कि मैं अपनी ज़िद के ख्वाबों को पूरा करूँ,
माँ-बाप के सपने सच हो जाएँ, बस इसी एक संकल्प से आगे बढ़ूँ।
हर रात जागा हूँ मैं, पर अब अपने निजी सपनों के पीछे नहीं भागा हूँ,
अपनी अधूरी हसरतों को गुज़री यादों के संदूक में रख आया हूँ।
मैं हारा नहीं हूँ दुनिया से, बस मैंने अपने रास्तों को मोड़ा है,
जो लम्हे कभी मेरे थे, अब उन्हें भुलाकर नया हौसला जोड़ा है।
हाँ, मैं घर का छोटा बेटा हूँ, पर कंधों पर फ़र्ज़ बड़ा रखता हूँ,
माँ-बाप के चेहरे की मुस्कान पर, अपनी हर एक खुशी वार रखता हूँ।
खुद की अब कोई हसरत नहीं, बस माँ-बाप के लिए कुछ बड़ा करना है,
अपने दिल के अरमानों को दबाकर, घरवालों का हर एक सपना पूरा करना है।
ख्वाब टूटे तो क्या, अपनों के चेहरों को गुलज़ार कर आया हूँ,
मैं छोटा बेटा हूँ तो क्या, घर का सबसे मजबूत स्तंभ बन आया हूँ।
मैं अपने बचपन के उन नादान ख्वाबों को अब पीछे छोड़कर,
तमीज, तहज़ीब और जिम्मेदारियों के उसूलों को अपनी
जिंदगी बना आया हूँ।
 
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3 महीने पहले

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