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ज़िंदगी फ़िर तुझे गुनगुना ना सका

                
                                                         
                            एक मुद्दत से निकला था , खुशियां ढूंढ़ने जमाने में।
                                                                 
                            
कितना आसान था , होंठों से मुस्कुरा न सका।
ज़िंदगी फ़िर तुझे गुनगुना ना सका।।

आधियों तुमनें ही गिराएं हैं, घर परिंदों के ।
तुमको पंछी का खयाल आ ना सका।
जिंदगी फ़िर तुझे गुनगुना ना सका।।

दरिया बहा ले गया वक्त के लम्हे ।
में ही ख़ुदको दरिया में बहा न सका।
ज़िंदगी फिर तुझको गुनगुना न सका।।

इतना चाहा था तुझे रूह की गहराइयों में
बात गहरी थी लब्जों में जता न सका।
ज़िंदगी फिर तुझको गुनगुना न सका।।
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3 महीने पहले

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