वो जब चश्म-ए-नीम-बाज़ से इज़्हार करते हैं,
क़यामत सादगी में हुस्न की तय्यार करते हैं
झुकी पलकों की वो हल्की ख़मीदगी तो देखो तुम,
कि जैसे होश खोकर ख़ुद को हुश्यार करते हैं
सुना है लम्स की पाकीज़गी के ख़ौफ़ से वो भी,
हवा को चूम कर रातों को बेदार करते हैं
अजब है सुर्ख़ी-ए-रुख़सार का वो काँपना उनका,
कि ख़ुद अपने ही शरमाने से इंकार करते हैं
ग़ज़ाल-ए-दस्त-ए-उल्फ़त हैं मगर इस नाज़ का क्या कहें,
शिकारी ख़ुद तड़प कर जान पामाल करते हैं
कोई कह दे ये उन शोला-मिज़ाजों से कि ऐ 'शाह',
वो मीठी डाँट से भी इश्क़ की बौछार करते हैं
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